16 सितंबर को दुनिया विश्व ओजोन दिवस मनाती है। इस दिन को अक्सर एक औपचारिक पर्यावरणीय तारीख़ मानकर छोड़ दिया जाता है, जबकि सच्चाई यह है कि यह मानव इतिहास की उन गिनी-चुनी मिसालों में से एक है जहाँ दुनिया ने एक वैश्विक संकट को पहचाना, उस पर सहमत हुई, और उसे सचमुच हल कर दिया। 2026 की थीम इसी विरासत के अगले अध्याय की ओर इशारा करती है — “एक ठंडे ग्रह के लिए वैश्विक कार्रवाई”, जो मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के किगाली संशोधन के दस साल पूरे होने का उत्सव है।
यह दिन क्यों मनाया जाता है
16 सितंबर 1987 को मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर हुए थे — ओजोन परत को नुक़सान पहुँचाने वाले पदार्थों के उत्पादन और उपभोग को चरणबद्ध ढंग से ख़त्म करने की संधि। 1994 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इसी तारीख़ को ओजोन परत के संरक्षण के अंतरराष्ट्रीय दिवस के रूप में घोषित किया। मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल आज तक इकलौती ऐसी संयुक्त राष्ट्र संधि है जिसे दुनिया के हर सदस्य देश ने अनुसमर्थित किया है — और इसके तहत ओजोन को क्षति पहुँचाने वाले लगभग 99 प्रतिशत रसायन चलन से बाहर किए जा चुके हैं।
ओजोन परत समतापमंडल में मौजूद एक पतली परत है जो सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों का बड़ा हिस्सा सोख लेती है। इसके बिना त्वचा कैंसर और मोतियाबिंद के मामले बढ़ते, फ़सलें प्रभावित होतीं और समुद्री जीवन की बुनियाद कमज़ोर पड़ती। 1980 के दशक में जब अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन छिद्र की पुष्टि हुई, तो पहले 1985 में वियना कन्वेंशन आया और फिर 1987 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल।
समस्या हल हुई, तो नई समस्या कहाँ से आई
यहीं इस कहानी का सबसे दिलचस्प मोड़ है। सीएफ़सी यानी क्लोरोफ़्लोरोकार्बन को हटाने के लिए उद्योग ने जिन विकल्पों की ओर रुख़ किया, उनमें एचएफ़सी (हाइड्रोफ़्लोरोकार्बन) प्रमुख थे। एचएफ़सी ओजोन परत को नुक़सान नहीं पहुँचाते — और इस लिहाज़ से समाधान सफल रहा। लेकिन वे बेहद शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें हैं, जिनकी ग्लोबल वार्मिंग क्षमता कार्बन डाइऑक्साइड से सैकड़ों-हज़ारों गुना अधिक हो सकती है। यानी एक समस्या सुलझाते हुए दुनिया ने दूसरी समस्या बो दी।
इसी को ठीक करने के लिए 15 अक्टूबर 2016 को किगाली संशोधन अपनाया गया, जिसके तहत देशों ने एचएफ़सी के उत्पादन और उपभोग को चरणबद्ध ढंग से घटाने की समयसीमा तय की। 2026 की थीम इसी संशोधन के दस साल पूरे होने को रेखांकित करती है, और इसका ज़ोर टिकाऊ कूलिंग पर है — यानी ठंडक ऐसी हो जो न ओजोन को नुक़सान पहुँचाए, न जलवायु को।
भारत की भूमिका और उपलब्धियाँ
भारत जून 1992 से मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल का पक्षकार है। तय समयसीमा के अनुरूप भारत ने 1 जनवरी 2010 तक नियंत्रित उपयोगों के लिए सीएफ़सी, कार्बन टेट्राक्लोराइड, हैलॉन, मिथाइल ब्रोमाइड और मिथाइल क्लोरोफ़ॉर्म को चलन से बाहर कर दिया था। इसके बाद एचसीएफ़सी को चरणबद्ध ढंग से हटाने का काम चल रहा है, जो रेफ़्रिजरेशन, एयर कंडीशनिंग और फ़ोम उद्योग से जुड़ा है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय का ओज़ोन सेल 1995 से हर साल राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर यह दिवस आयोजित करता आ रहा है।
भारत की स्थिति ख़ास इसलिए है क्योंकि यहाँ कूलिंग की माँग अभी ठीक से शुरू ही हुई है। देश की बड़ी आबादी के पास आज भी एयर कंडीशनर नहीं है, और आय बढ़ने के साथ यह माँग कई गुना बढ़नी तय है। साथ ही यह सिर्फ़ आराम का सवाल नहीं है — दवाओं और टीकों की कोल्ड चेन, फल-सब्ज़ियों का भंडारण, डेटा सेंटर और बढ़ती गर्मी में जनस्वास्थ्य, सब ठंडक पर निर्भर हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए भारत ने इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान तैयार किया था, जिसका मक़सद क्षेत्रवार कूलिंग माँग, रेफ़्रिजरेंट की ज़रूरत और ऊर्जा दक्षता को एक साथ देखना है।
असली चुनौती: ठंडक चाहिए, गर्मी बढ़ाए बिना
कूलिंग से जलवायु पर दो तरह का बोझ पड़ता है। पहला सीधा है — मशीन में भरी रेफ़्रिजरेंट गैस अगर रिसती है या इकाई के जीवन के अंत में ठीक से नहीं निकाली जाती, तो वह सीधे वायुमंडल में पहुँचती है। दूसरा अप्रत्यक्ष है — एसी और फ़्रिज चलाने में लगने वाली बिजली, जो भारत में बड़े हिस्से में अब भी कोयले से बनती है। इसीलिए अच्छी नीति सिर्फ़ गैस बदलने तक सीमित नहीं रह सकती; उसे उपकरणों की ऊर्जा दक्षता, इमारतों के डिज़ाइन और मरम्मत-रखरखाव की गुणवत्ता तक जाना पड़ता है।
यह जानकर हैरानी हो सकती है कि एक एसी की असली जलवायु लागत का बड़ा हिस्सा उसके रेफ़्रिजरेंट से नहीं, बल्कि उसके जीवनकाल में खपी बिजली से आता है। इसका मतलब है कि पुराना, कम दक्ष एसी चलाते रहना अक्सर उससे ज़्यादा नुक़सानदेह होता है जितना लोग मानते हैं।
आम लोग क्या कर सकते हैं
- नया एसी या फ़्रिज ख़रीदते समय ऊर्जा दक्षता रेटिंग देखें — ऊँची रेटिंग की अतिरिक्त क़ीमत आमतौर पर कुछ ही सालों में बिजली बिल से वसूल हो जाती है।
- एसी का तापमान बहुत नीचे रखने के बजाय मध्यम स्तर पर रखें और पंखे के साथ इस्तेमाल करें; इससे खपत उल्लेखनीय रूप से घटती है।
- फ़िल्टर की नियमित सफ़ाई और सर्विसिंग कराएँ — गंदा फ़िल्टर कंप्रेसर पर बोझ बढ़ाकर बिजली की खपत बढ़ाता है।
- पुराने उपकरण कबाड़ में देते समय प्रशिक्षित तकनीशियन से गैस निकलवाएँ, ताकि रेफ़्रिजरेंट सीधे वायुमंडल में न जाए।
- छत पर परावर्तक रंग, खिड़कियों पर छाया और क्रॉस वेंटिलेशन जैसे उपाय ठंडक की ज़रूरत को शुरुआत में ही घटा देते हैं।
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल की सबसे बड़ी सीख तकनीकी नहीं, राजनीतिक है: वैज्ञानिक प्रमाण, सर्वसम्मत भागीदारी, तय समयसीमा और विकासशील देशों के लिए वित्तीय मदद — इन चार चीज़ों को साथ रखकर दुनिया एक वैश्विक पर्यावरणीय संकट सुलझा चुकी है। जलवायु परिवर्तन की समस्या इससे कहीं बड़ी और जटिल है, लेकिन यह दिन याद दिलाता है कि सामूहिक कार्रवाई असंभव नहीं है। ओजोन परत आज भी धीरे-धीरे ठीक हो रही है — इस बात का सबूत कि एक बार दुनिया ने सही क़दम उठाया था।