हर ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले सोशल मीडिया पर एक ही दावा लौटकर आता है — “ब्रिक्स अपनी नई मुद्रा लॉन्च करने जा रहा है, डॉलर का खेल ख़त्म।” 12 और 13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में हुए 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले भी यही दावा ज़ोर-शोर से चला। सम्मेलन ख़त्म हो चुका है, नई दिल्ली घोषणापत्र सर्वसम्मति से अपनाया जा चुका है, और उसमें साझा ब्रिक्स मुद्रा का कोई ज़िक्र नहीं है। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि कुछ हुआ ही नहीं। जो हुआ है, वह हेडलाइन से कम चमकदार है मगर व्यवहार में कहीं ज़्यादा असरदार है।
घोषणापत्र में मुद्रा को लेकर असल में क्या है
भारत की अध्यक्षता में हुए इस सम्मेलन की थीम थी — लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता का निर्माण। घोषणापत्र पहले ही दिन, यानी 12 सितंबर को, बंद सत्र के बाद अपनाया गया। मुद्रा के मोर्चे पर दस्तावेज़ की भाषा बेहद नपी-तुली है। इसमें ब्रिक्स पेमेंट टास्क फ़ोर्स के काम का ज़िक्र है, जिसने सीमा-पार भुगतान और मैसेजिंग चैनलों की आपसी इंटरऑपरेबिलिटी का अध्ययन किया है, और व्यापार तथा निवेश के निपटान में सदस्य देशों की अपनी मुद्राओं के इस्तेमाल पर चर्चा की है। टास्क फ़ोर्स से कहा गया है कि वह ऐसे भुगतान तंत्र पर काम जारी रखे जो तेज़, कम लागत वाले, सुलभ, पारदर्शी और सुरक्षित हों।
इससे कुछ दिन पहले, 10 सितंबर को, ब्रिक्स के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक गवर्नरों के संयुक्त बयान में भी यही रुख़ दिखा था। उसमें साफ़ कहा गया कि इस मामले में “एक ही नुस्खा सबके लिए” वाला रास्ता नहीं चलेगा। नई विकास बैंक (एनडीबी) को लेकर भी सहमति बनी कि उसकी सदस्यता बढ़े और वह स्थानीय मुद्राओं में ज़्यादा कर्ज़ दे। यानी पूरी क़वायद मुद्रा बदलने की नहीं, भुगतान के रास्ते बदलने की है।
साझा मुद्रा और स्थानीय मुद्रा में व्यापार — यह एक चीज़ नहीं है
यहीं पर ज़्यादातर भ्रम पैदा होता है। साझा मुद्रा का मतलब होता है यूरो जैसी एक नई इकाई, जिसे सभी सदस्य देश अपनाएँ, जिसका एक साझा केंद्रीय बैंक हो और जिसके लिए सदस्यों को अपनी मौद्रिक नीति का बड़ा हिस्सा छोड़ना पड़े। स्थानीय मुद्रा में व्यापार का मतलब इससे बिल्कुल अलग है — भारत रूस से तेल ख़रीदे तो भुगतान रुपये या रूबल में हो, बीच में डॉलर लाने की ज़रूरत न पड़े। पहली चीज़ के लिए साझा संप्रभुता चाहिए, दूसरी के लिए सिर्फ़ दो केंद्रीय बैंकों के बीच तकनीकी इंतज़ाम चाहिए।
ब्रिक्स लगातार दूसरी वाली राह पर चल रहा है। भारत के लिए यह कोई नई बात नहीं। रिज़र्व बैंक ने 2022 में विदेशी बैंकों के लिए विशेष रुपया वोस्ट्रो खाते खोलने की व्यवस्था शुरू की थी, ताकि आयात-निर्यात का निपटान सीधे रुपये में हो सके। यूपीआई को कई देशों के भुगतान तंत्र से जोड़ने की कोशिशें भी इसी दिशा का हिस्सा हैं। घोषणापत्र की भाषा असल में उसी काम को बहुपक्षीय मंज़ूरी देती है जो सदस्य देश द्विपक्षीय स्तर पर पहले से कर रहे हैं।
साझा मुद्रा इतनी मुश्किल क्यों है
कारण भावनात्मक नहीं, गणितीय हैं। एक साझा मुद्रा के लिए सदस्यों की अर्थव्यवस्थाओं का चक्र कमोबेश एक जैसा चलना चाहिए। ब्रिक्स में ऐसा कहीं नहीं है — चीन की विशाल विनिर्माण अर्थव्यवस्था, रूस की प्रतिबंधों से घिरी संसाधन-आधारित अर्थव्यवस्था, भारत की सेवा-प्रधान और तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, और दक्षिण अफ़्रीका या इथियोपिया की बिल्कुल अलग ज़रूरतें, इन सबके लिए एक ब्याज दर तय करना असंभव के क़रीब है।
दूसरी अड़चन पूँजी खाते की है। साझा मुद्रा के लिए सदस्य देशों को पूँजी की आवाजाही पर नियंत्रण ढीला करना पड़ेगा, जो चीन और भारत दोनों अपनी-अपनी वजहों से नहीं करना चाहते। तीसरी अड़चन भरोसे की है — किसी भी साझा मुद्रा में सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का दबदबा स्वाभाविक रूप से बन जाता है, और भारत किसी ऐसे तंत्र में जाने को तैयार नहीं होगा जो व्यवहार में युआन का विस्तार बन जाए। यही वजह है कि तमाम शिखर सम्मेलनों में यह प्रस्ताव औपचारिक एजेंडे तक नहीं पहुँचता।
तो डी-डॉलराइज़ेशन का असली अर्थ क्या है
अगर डी-डॉलराइज़ेशन का मतलब यह है कि डॉलर दुनिया की मुख्य रिज़र्व मुद्रा नहीं रहेगा, तो वह फ़िलहाल कहीं नहीं दिख रहा। लेकिन अगर मतलब यह है कि कुछ ख़ास व्यापार गलियारों में डॉलर की ज़रूरत घटती जाएगी, तो वह पहले से हो रहा है और घोषणापत्र उसे गति देता है। विश्लेषकों का आकलन यही है कि यह बदलाव किसी नाटकीय घोषणा से नहीं, बल्कि हज़ारों छोटे-छोटे व्यावसायिक लेनदेन के ज़रिए आएगा — एक कंपनी, एक बैंक, एक कॉरिडोर, एक बार में।
भारत के लिए इसका ठोस फ़ायदा क्या है? दो चीज़ें। पहली, रुपये में निपटान होने पर निर्यातकों और आयातकों को डॉलर में बदलने की दोहरी लागत और विनिमय दर का जोखिम कम पड़ता है। दूसरी, अमेरिकी वित्तीय तंत्र के ज़रिए लगने वाले प्रतिबंधों के प्रति संवेदनशीलता घटती है। इसकी सीमा भी साफ़ है — रुपये में भुगतान तभी टिकाऊ है जब सामने वाले देश के पास रुपये ख़र्च करने लायक भारतीय सामान ख़रीदने की गुंजाइश हो, वरना उसके खाते में रुपये जमा होते चले जाते हैं।
घोषणापत्र के बाक़ी बड़े बिंदु
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के व्यापक सुधार की माँग, जिसमें भारत और ब्राज़ील की बड़ी भूमिका की आकांक्षा को समर्थन मिला।
- आतंकवाद पर कड़ा रुख़, जिसमें 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर में हुए आतंकी हमले की निंदा और अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक संधि (CCIT) को अपनाने का आह्वान शामिल है।
- एकतरफ़ा व्यापारिक शुल्क, द्वितीयक प्रतिबंध और विश्व व्यापार संगठन के नियमों से मेल न खाने वाले कार्बन सीमा शुल्क जैसे क़दमों का विरोध — किसी देश का नाम लिए बिना।
- पश्चिम एशिया में संयम की अपील, ग़ज़ा में तत्काल युद्धविराम और मानवीय सहायता की निर्बाध आपूर्ति की माँग।
- नई विकास बैंक के विस्तार और स्थानीय मुद्रा में उसके वित्तपोषण को बढ़ाने पर सहमति।
समूह में अब ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ़्रीका के अलावा मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया भी शामिल हैं। इतने अलग-अलग हितों वाले देशों का एक ही दस्तावेज़ पर सहमत हो जाना अपने आप में भारत की अध्यक्षता की उपलब्धि माना जा रहा है, ख़ासकर तब जब ईरान और यूएई क्षेत्रीय संघर्ष में अलग-अलग पक्षों पर खड़े हैं। अगले साल, 2027 में, शिखर सम्मेलन की मेज़बानी चीन करेगा।
आगे किस चीज़ पर नज़र रखें
अगले बारह महीनों में असली कहानी घोषणापत्र की भाषा में नहीं, बल्कि आंकड़ों में दिखेगी — भारत-रूस और भारत-यूएई व्यापार में रुपये के निपटान का हिस्सा कितना बढ़ता है, एनडीबी अपने कुल कर्ज़ का कितना प्रतिशत स्थानीय मुद्राओं में देती है, और यूपीआई जैसे तंत्र कितने नए देशों से जुड़ते हैं। अगर ये तीनों संख्याएँ चढ़ती हैं तो समझिए कि बदलाव हो रहा है, भले ही कोई नई मुद्रा कभी छपे ही नहीं। और अगर अगले साल फिर कोई दावा करे कि ब्रिक्स करेंसी लॉन्च हो रही है, तो उससे बस एक सवाल पूछिए — उसका केंद्रीय बैंक कौन होगा?